साँवरो सलूणो छायो नैण मं जी

साँवरो सलूणो छायो नैण मं जी

तर्ज़ – पणिहारी

साँवरो सलूणो छायो नैण मं जी,
मीठी-मीठी मुस्कान,
वो जळाय गयो ज्यान,
वो नटनागरियो, मेरै मन भाय गयो ।।
रस बरसै बैं की बैण मं जी,
कांई करूँ गुणगान,
म्हारो साँवरो सुजान,
संकड़ै रस्तै मं, आडै आ गयो ।।

दोहा
प्रीत गळी मं मिल गयो, स्यामीं नंदकुमार
नीची नजरां हो गई, नैणा नेह कटार
नटखट नट तिरछा चरण,
कजरारै दोऊ नैण,
तिरछी चितवन सैं करयो, यो मनवा बैचैन
अन्तरा
यादां आई बैं की रैन मं जी,
चाहे मान मत मान, रस माधुरी को पान,
घूँट भरी ऐसी, जियो भरमा गयो ।।

दोहा
जद सेती चित्त पर चढ्यो,
सुध – बुध दीन्ही खोय,
दरदी जाणै दर्द नै, जो कोई दरदी होय
विरहा मं जिवड़ो जळै,
कल न पड़ै दिन रात,
बारूं मास रुकै नहीं, नैणा की बरसात
अन्तरा
बेदर्दी की सैण मं जी,
फँस गया बैरी प्राण ज्यूं पुराणी हो पिछाण
लटक दिखाकै जी, मोय तरसा गयो ।।

दोहा
चोरां को सिरदार है, छलियां को सिरमौर
श्यामबहादुर मनगरो, चंचल चित को चोर
संकटहारी साँवरो, बृजभूषण गोपाल
कुमति हरै मंगल करै, केशव दीनदयाल
अन्तरा
‘शिव’ भी लाग्यो लैण मं जी,
म्हारा मोटा जजमान,
दीज्यो बिनती पै ध्यान,
झलक दिखाकै जी, दरद मिटा गयो ।।

ज्यान = जान, प्राण ● बैण = बाँसुरी
संकड़ै = संकडा ◆ बैरी = दुश्मन
स्यामीं = सामने ● रैन = रात
कल = चैन, आराम ◆ बारूं = बारहों
सैण = नैनों का इशारा ● लैण = लाइन

श्रद्धेय स्व. शिवचरण जी भीमराजका
‘शिव’ द्वारा राजस्थानी गीत ‘पणिहारी’
की तर्ज़ पर आधारित श्याम वन्दना ।

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